Sunday, October 16, 2011

अर्थ हुआ कुअर्थ

अब समझने का न रहा समर्थ,
बदल रहे शब्दों के अर्थ!

ब्राह्मण कुल में जन्मा मुर्ख भी,
अब परम-पूज्य हो जाता है!
हर लम्बी-दाढ़ी चोंगावाला,
साधु-संत कहलाता है!!

दूध के लिये गाय पालना,
मूर्खता का बोध कराता है!
पर कुत्तों के संग सुबह टहलना,
सामाजिक-प्रतिष्ठा दर्शाता है!!

फ़िल्मी डांस और गाना बजा,
हम मूर्ति-पूजन करते हैं!
मानव से अब कौन डरे,
भगवान् से भी नहीं डरते हैं!!

सत्य-अहिंसा व् चोरी नहीं करना,
हर मानव-धर्म का यही था कहना!
ये हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई,
सम्प्रदायों के नाम है भाई!!

शील-समाधि-ज्ञान-प्रज्ञा ही,
मूल-धर्म कहलाते थे!
इन्हें ही पालन करनेवाले,
धार्मिक माने जाते थे!!

सच्चाई के तरफ इशारा मात्र भी,
अब गांधीगीरी कहलाता है!
मानव-धर्म की चर्चा करनेवाला,
हास्य-पात्र बन जाता है!!

अब तो गोरी-चिकनी काया ही,
सुन्दरता की हुई परिभाषा!
देख बिशाल कैसी बदल रही है,
मानवता और धर्म की भाषा!!

अर्थ-कुअर्थ के भवंर में डूबे,
चित्त की सुन्दरता को भूल रहे!
अपने मतलब का अर्थ बना,  (व्याकुल हो)
हम अहंकार में झूल रहे !!
हम अहंकार में झूल रहे......!!-2

Friday, October 14, 2011

दादी का त्यौहार दादा का प्यार (करवाचौथ special)











ये करवाचौथ है फिर से आया,
संग प्यार का नया सौगात है लाया!
तेरे व्रत की आरती, स्पर्श चन्दन के,
नए गाँठ जोड़ते, अपने बंधन के!!

वो करवाचौथ की पहली साल,
जब तुझे देख मैं हुआ निहाल!
दुल्हन सी सजी, तब तू आगन में, चाँद देखने आयी थी,
तुझे देखकर चंदा भी, अपनी चांदनी पे इतरायी थी!!

कहने को अब है उमर ढली,
पर तू आज भी लगती वही कली!
मेरी जान है तू, अभिमान है तू,
मेरी धड़कन की पहचान है तू!!

तेरे दम पे ही चलता हूँ,
तेरे साँसों से-ही साँसे भरता हूँ!
तुने सालों-साल तक साथ निभाया,
धन्य हुआ जो तुझको पाया!!

तेरे बिन जीना न गवांरा है,
इस बुढ़ापे की इक तू ही सहारा है!
इस बुढ़ापे की  इक तू ही सहारा है....!!