Wednesday, November 19, 2014

सच्चा सच्च








युगों से यात्रा शुरू है तेरी,
यह जन्म भी इसका हिस्सा है!
इससे पहले जाने कितने,
जन्मों का तेरा किस्सा है !!

समय की चकरी घूम रही,
दुःख-सुख धूप और छाँव हैं !
तेरे इस सफर में साकी,
मृत्यु एक पड़ाव है !!

इस जनम का नाता-रिश्ता,
यही समाप्त हो जाएगा !
तेरी अगली यात्रा में,
साथ कोई नहीं आएगा !!

यह शरीर जिसे तू 'मैं' कहता है,
वो भी मिट्टी में मिल जाएगा !
अपने कर्मों के अनुरूप,
इक नया शरीर तू पायेगा !!

फिर कौन अपना है, कौन पराया,
इस गूढ़ रहस्य को जान लो !
माया-मोह के बंधन से उठ,
कर्म-भेद पहचान लो !!

बार-बार कहता बिशाल,
नित-ध्यान करो, और योग करो !
अपने इस मानव जीवन का,
अच्छे से उपयोग करो !!

अच्छे से उपयोग करो...
तुम अच्छे से उपयोग करो....!!

Wednesday, October 22, 2014

दीवाली - 2014










Heidelberg में आज दीवाली,
मिलकर हम मनाएंगे !
घंटो-तक हमसब मिलकर,
मस्ती के दीये जलाएंगे !!

इन दीपों का प्रकाश,
खुशियों की लहर फैलायेगा !
अंधियारा सबके मन-मंदिर का,
क्षण-भंगुर हो जायेगा !!

ठुमका, गान, बाज भी होगा,
DJ का आगाज भी होगा !
धड़कन-धड़कन थिड़केगा !
साँसों की अंगराई से,
रोम-रोम आज फिड़केगा !!

दिल से दिल का तार भी होगा !
मस्ती के इस वारिश में,
छुपी नजरों से वार भी होगा !!

उन वारों की चिंगारी,
दिल के दीये जलाएंगी !
मन-मंदिर को क्षण-भर में,
प्रकाशमान कर जाएंगी !!

आओ जलाएं, प्यार का दीप !
मानवता के सार का दीप !
खुशियाँ और सौहार्द का दीप !
निजकर्मों से पुरुषार्थ का दीप !

इन दीपों  के जगमग से,
सब भाव-विभोर हो जाएंगे !
Heidelberg  में आज दीवाली,
मिलकर हम मनाएंगे…
घंटो तक हमसब मिलकर,
मस्ती के दीये  जलाएंगे ।।

Friday, July 4, 2014

ज्ञान-चक्षु

जन्म होने पे सब पाते, केवल सांसे और धडकन!
भूल इन्हे हम पिरो देते हैं, रिश्तोँ का बंधन !!

किसी का बेटा, किसी का भांजा, किसी का नाती-पोता !
चढ़ा चश्मा इन रिश्तों का, सब जीवन ज्योत है खोता!!

राग-द्वेष से विरत हर बच्चा, होता निर्मल निश्छल !
अपने पराये का भेद न जाने, ढूंढता करुणा पल-पल !!

अब बूँद-बूँद माया-मोह का, जो घूंट लिया वो क्षण-क्षण !
इस काल-चक्र की चकरी में, भुलाया सांस और धड़कन !!

आमूढ़ संस्कारों के परत तले, फ़िर दबने लगा अंतर्मन !
और द्वेष-राग से दहक उठा, तृष्णा से भरे ये तन-मन !!

ये राग-द्वेष सुखी लकड़ी के भाँती, जलाये शरीर के इंजन !
तृष्णा है पेट्रोल ओ साकी, दूर रख ऐसे  ईंधन !!

चाहे बचपन हो या यौवन हो, या बुढ़ापे की साया !
प्रियतमा से भी प्यारी होती, सबकी अपनी काया !!

(इसके) नश्वरता का मूल समझ, देख ! क्या खोया क्या पाया!
ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का, की, न फटक सके कोइ माया !!

 न फटक सके कोइ माया साखी,  न फटक सके कोइ माया!!

Wednesday, January 22, 2014

प्यार का मौसम










लो फिर से आ गया है,
प्यार का ये मौसम !
भौरों का कलियों से,
दिलदार का ये मौसम !!

समाँ धूप में सनी है,
हवा में कनकनी है !
भौरें भवंर रहे हैं,
कलियाँ सवंर रही हैं!

समय की इस घड़ी में,
जवाँ दिल धड़क रहे हैं !
दिलवर को याद करके,
अंग-अंग फड़क रहे हैं !!

दिल की धड़कनों का,
आयाम जड़ रहा है !
इन्हे व्यक्त करने खातिर,
हर शख्स होठों का,
व्यायाम कर रहा है !!

फिर से आ गया है,
प्यार का ये मौसम !
भौरों के कलियों से,
दिलदार का ये मौसम !!

दिलदार का ये मौसम,
प्यार का ये मौसम !!!!