Friday, July 4, 2014

ज्ञान-चक्षु

जन्म होने पे सब पाते, केवल सांसे और धडकन!
भूल इन्हे हम पिरो देते हैं, रिश्तोँ का बंधन !!

किसी का बेटा, किसी का भांजा, किसी का नाती-पोता !
चढ़ा चश्मा इन रिश्तों का, सब जीवन ज्योत है खोता!!

राग-द्वेष से विरत हर बच्चा, होता निर्मल निश्छल !
अपने पराये का भेद न जाने, ढूंढता करुणा पल-पल !!

अब बूँद-बूँद माया-मोह का, जो घूंट लिया वो क्षण-क्षण !
इस काल-चक्र की चकरी में, भुलाया सांस और धड़कन !!

आमूढ़ संस्कारों के परत तले, फ़िर दबने लगा अंतर्मन !
और द्वेष-राग से दहक उठा, तृष्णा से भरे ये तन-मन !!

ये राग-द्वेष सुखी लकड़ी के भाँती, जलाये शरीर के इंजन !
तृष्णा है पेट्रोल ओ साकी, दूर रख ऐसे  ईंधन !!

चाहे बचपन हो या यौवन हो, या बुढ़ापे की साया !
प्रियतमा से भी प्यारी होती, सबकी अपनी काया !!

(इसके) नश्वरता का मूल समझ, देख ! क्या खोया क्या पाया!
ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का, की, न फटक सके कोइ माया !!

 न फटक सके कोइ माया साखी,  न फटक सके कोइ माया!!