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श्रद्धांजलि- श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी

एक और जीवन की गौरव-गाथा, सबके मुख की सार हुई है ! भारत माँ के इक लाल की, फिर से आज जयकार हुई है !! इनके चित्र और शब्दों का, सबने है सोशल प्रोफाइल बनाया ! भाव-भंगिमा में आकर, उन्हें माँ भारती का लाल बताया !! ये सब कहाँ थे, जब साँसे इनकी, वृद्ध-व्याधि से हार रही थी ! देख दशा इस लाल की, जब माँ भारती चीत्कार रही थी !! आज मृत शरीर पे फूल बरसा, लोग झांकी लेकर घूम रहे हैं ! इनके वचनों की जय-जयकार, आसमां को चूम रहे हैं !! मातृ-सेवा का व्रतधारी, पौरुषता का मिशाल बना जो ! जीवन की लौ में तप-तपाकर, माँ भारती की ढाल बना जो !! उस कालजयी शिखर पुरुष की, सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी ? चलो दो पल विचार करें हम, जो अंतरात्मा आवाज लगाए, उसे आज स्वीकार करें हम !!

विद्यार्थी-जीवन (Specially for students in age group 15-25 years)

विद्यार्थी-जीवन, होता सबसे न्यारा ! इसके हाथों में होता है, भाग्य हमारा !! संभावनाओं से, भरपूर यह होता ! ऊर्जा भी इसमें, प्रचुर होता !! यह ऊर्जा हमारी, कौतुहलता बढ़ता ! (high kinetic energy) कभी कभी हममें, हाताशी भी लाता !! (high static energy) क्षण-भर में समझता, जग का हूँ नायक ! अगले-क्षण समझता, किसी के न लायक !! कच्ची-समझ, कुछ समझ नहीं पाती ! ऊपर से अपनी, यौवनता सताती !! इसी बीच सभी कहते हैं, पढ़ने को ! कलम की स्याही से, जीवन गढ़ने को !! समझ नहीं आये, जीवन का झमेला ! इस भवँर में पाऊं मैं, खुद को अकेला !! बिशाल भैया ने, मुझे पास बुलाया ! विद्यार्थी-जीवन की महत्ता समझाया !! "अभी की ऊर्जा है, तेरी जिव्यशक्ति ! पढाई हीं है, तेरी मातृभक्ति !! इस ऊर्जा को, तटीकृत कर ले तू ! मन की चंचलता, नियंत्रित कर ले तू !! नित्-ध्यान कर, इक्षाशक्ति बढ़ाओ ! हर-रोज पढ़ने की, आदत लगाओ !! विद्यार्थी-जीवन होता सबसे न्यारा ! इसकी मुट्ठी में होता है, जीवन हमारा !! विद्यार्थी-जीवन होता सबसे न्यारा...."

महायुद्ध (Mahayuddh)

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जब अँधेरे में स्थिर बैठा, अंगों का हलचल शांत हुआ ! स्वास-पथ पे चलते चलते, पल-पल मन में होनेवाले, तब महायुद्ध का ज्ञात हुआ !! यहाँ धर्मयुद्ध है, व् कर्मयुद्ध भी, मन का मन ही प्रतिद्वंदी है ! बुद्धि-विवेक और समझ हमारी, अज्ञानता के बंदी हैं !! लोभ-मोह और भोग-विलास, एक खेमे में रहते हैं ! ज्ञान, त्याग और सहनशीलता, दूसरे खेमे में बसते हैं !! क्या करूँ, क्या नहीं करूँ, युद्ध का संतुलन बतलाता है ! जिसको जितना बलवान किया, स्वाभाव वही बन जाता है !! मन ही सच्चा दोस्त बना, और मन ही जानी-दुश्मन ! कहता बिशाल, कर ले तू साकी, मन से मन का अर्पण !!

आत्मबोध - III

मन-मंदिर के अंतःकण में, घोर विचलन के इस क्षण में ! विशाल को नहीं सूझ रहा, किससे और क्यों वो जूझ रहा !! लोक-लाज की छाया में, व् कलियुग की काली माया में ! सब कहते "तू कर ले शादी", मिल जायेगी जीवनसाथी !! सबके पास एक पार्थ हैं, (पार्थ = candidate) सबका अपना स्वार्थ हैं ! कोई दहेज़ से तौल रहा है, कोई सौंदर्य से मोल रहा है !! नित-प्रतिदिन वर्षों से में, इक ही बात बोल रहा हूँ ! क्षण-प्रतिक्षण, अपने जीवन से, जीने के राज खोल रहा हूँ !! चाह नहीं नए रिश्तों के, बंधन में बँधता जाऊं। चाह नहीं शादी करके, एकांकी परिवार बनाऊं !! आधा जीवन बीत चुका, आधा जीवन ही बाकी है ! मेरे जीवनपथ पे मिलनेवाले, जन-जन मेरे साकी हैं !! माया-मुक्त हो चलते जाना, मेरे जीवन का भावार्थ है ! बंधन-मुक्त हो दुनिया त्यागूँ , मेरा यही स्वार्थ है !! मेरा यही स्वार्थ है...... बस मेरा यही स्वार्थ है......!!

अर्थ हुआ कुअर्थ- 'दिवाली'

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अब समझने का न रहा समर्थ, बदल चुका दिवाली का अर्थ ! आज ढोल-नगाड़े बजते हैं, दीपों से आँगन सजते हैं ! ये आशय तो सूझ रहा है, पर विशाल कहीं और जूझ रहा है !! पश्चिम में नववर्ष मानते, दक्षिण  में हरिकथा सुनाते ! काली पूजा पूरब में करते, लक्ष्मी पूजा उत्तर में !! दिवाली उत्सव का भारत में, कारण हुआ अनेक ! तारीख-तरीका इन जश्नों का, फिर कैसे हुआ एक !! मानसून अब लौट चला है, सील अभी भी भारी है !! सूरज की गर्मी से अब, कीटों का विस्तार जारी है !! इस उत्सव की छाया में, विभिन्न मान्यताओं की माया में ! सब साफ़-सफाई करते हैं ! घर-आँगन और गलियारों की, रंग पुताई करते हैं !! अनेकों कीट  मरते हैं, कितनों के घर उजड़ते हैं ! फिर, दिवाली की जज्बात में, अमावस्या की काली रात में ! ढोल और नगाड़े बजाकर, हर तरफ दीये  जलाकर ! उन बेघर कीटों को हम, प्रकाश दिखा रिझाते थे ! दीयों के पास उन्हें बुलाकर, दीयों से उन्हें जलाते थे !! नये फैशन के चकाचौंध में, और व्यस्तता की औंध में ! ढोल-नगाड़ों की जगह, अब खूब पटाखे जलते हैं ! जिससे रोगी, वृद्ध और परिंदे, सांस लेन...

आज की राज

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मानस! क्यूँ आकुल है तू ! किस कारण व्याकुल है तू !! तू जल रहा है राग में, कामना की आग में ! रिद्धि-सिद्धि के लिए, इस आग को तू रोक ले !! ध्येय अपना साधकर, उत्तेजना को बांधकर ! लक्ष्य के प्रयास में , तू पूरी ऊर्जा झोंक दे !! यह पल अभी जो आया है, वापस कभी न आएगा ! जिंदगी के राह का, इतिहास बन रह जाएगा !! दिन-प्रतिदिन ध्यान कर, जीने की कला सीख तू ! कर्मों के कलम से अभी, इतिहास अपना लिख तू !! कभी भी अधीर हो, भाग्य पे रोना नहीं ! विलासिता की चाह में समय व्यर्थ खोना नहीं ! यह समय बहुत बलवान है, जीवन की यही जान है ! इस समय अगर तू, कर्मोन्मुख  हो जाएगा! जीवन के डगर पे, रिद्धि-सिद्धि पायेगा !! रिद्धि-सिद्धि पायेगा, तू रिद्धि-सिद्धि पायेगा.....!!

आधुनिक शिवपूजा- एक पाप

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आज विशाल जो सोच रहा है, कहने में संकोच रहा है ! लोगों को शायद तनिक न सुझा, क्यों होती है शिव की पूजा ! क्या होता है शिव का अर्थ, क्यों पूजा-पाठ सब रहा व्यर्थ !! देकर दुनिया को अमृत, कहते हैं विषपान किया ! विष को कंठ में धारण करके, नीलकंठ का नाम लिया !! कहता विशाल, सोचो-जानो, विष के अवयवों को पहचानो ! काम-क्रोध, लोभ और माया, उसी विष की हैं, प्रतिच्छाया !! जो कोई इन अवयवों को, काबू में रखना सीख जाता है ! शिव-ललाट पे चाँद के भाँती, शीतलता, मुख पे पाता है !! उसके जीवन से हर क्षण, मैत्री की धार निकलती है ! जैसे गंगा, शिव के सर से, निरंतर प्रफुस्टित होती है !! गले में लिपटा हो भुजंग, फिर भी, भयभीत नहीं होता है ! कितना भी गहन संकट आये, संतुलन कभी नहीं खोता है !! कैलाशपति शिव-शंकर के भाँती, जो कोई निरंतर ध्यान करे ! प्रज्ञा रुपी तीसरी नेत्र जगाकर, स्वयं का कल्याण करे !! महंगाई के इस चढ़ते दौर में, हम मूर्ति का दुग्ध-स्नान कराते ! अंधभक्ति में, विष का प्रतीक, बेल-पत्र, धतूर और भांग चढ़ाते !! पूरा दिन, लाउडस्पीकर में, शिव-महिमा का गुणगान किया ! पर शिव-गुणों को अपनाने खातिर, क्षण-मात्र ...

प्यार की खुमार (एक लड़की का)

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फिर आया है प्यार का मौसम, प्रियवर से दिलदार का मौसम !! तुझसे दिल की तार हुई है, खुशियों की बौछार हुई है !! सुरूर तेरी चाहत का, इस कदर छाने लगा है ! हर-पल, हर-जगह, तू हीं नजर आने लगा है !! वीरान थी ये जिंदगी, तेरे आने से पहले ! तेरी साँसों का, मेरी साँसों में, समाने से पहले !! बन के जादू , मेरी रूह में, समाने लगा है तू ! बेचैन करके हर लम्हा। तड़पाने लगा है तू !! तुझसे मिलने की हर आहट से, अंग-अंग फड़कता है ! संग होने के एहसास से, जेहन-व्-दिल धड़कता है !! हर-क्षण तेरी ख्यालों में, मैं खोयी रहती हूँ ! तेरे सपनों के साये में ही, सोयी रहती हूँ !! दिल की बगिया में, ये मौसम, अजीब बहार लायी है ! कहता विशाल, ओ पगली !  तुझपे, प्यार की खुमार छायी है !! प्यार की खुमार छायी है !! तुझपे प्यार की खुमार छायी है !!

प्यार की खुमार (एक लड़के का)

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इस वसंत-वहार की बेला में, गुलों-गुलजार की मेला में ! प्यार से प्यारे, तेरे प्यारे नैना, दे प्यार ले लिए, मेरे रैना !! तेरे प्यार की प्यारी सौदेबाजी, प्यारा-प्यार सिखाती है ! चुपके-चुपके बड़े प्यार से, मुझ प्यारे को रिझाती है !! बंद-पलकों से, शरमाकर, मुख-मंडल पे लाली लाकर ! आगोश में जब तू आती है, पूरकता का बोध कराती है !! तेरी मखमली बाहों का, आलिंगन जब-जब पाता हूँ ! भुलाकर खुद की साँसों को, तेरी साँसों में, रम जाता हूँ !! उन साँसों की गर्माहट, साथ तेरे होने की आहट, अंग-अंग फड़काता है ! स्पर्श तेरे कोमल होठों का, पागल-दीवाना कर जाता है !! दिल की बगिया में, ये मौसम, प्यार का सावन लाया है ! कहता विशाल, ओ पगले तुझपे, खुमार प्यार का छाया है !! खुमार प्यार का छाया है.... खुमार प्यार का छाया है !!

आधुनिक सरस्वती पूजा - एक पापकर्म

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मन अपना आज विचलित पाया, जैसे निगल रही हो काली साया ! लोगो को अब नहीं है सूझा, कैसे कर रहे हम सरस्वती पूजा !! जो पठन-पाठन में हैं बागी, पढ़ने की इक्छा कभी न जागी ! सरस्वती पूजा के खातिर, उन्होंने ही, महीनो घूमकर चन्दा मांगी !! गली-गली में मूर्ति लाये, फूल-माला से खूब सजाये ! मूर्ति को दुल्हन बनाये, पर माँ की छवि, देख न पाये !! फ़िल्मी धुनों पे गाना बजा, झांकी लेकर चलते हैं ! मदिरा के मद्य में मत्त हो, असुरों की तरह उछलते हैं !! युवाओं के मन-मंदिर में, यह कैसा अन्धकार है छाया ! विशाल कुंठित हो सोच रहा, क्या यह कलियुग की है माया !! "स्वयं का सार" आलेखन करती, माँ सरस्वती कहलाती है ! परम-ज्ञान की द्योतक है ये, विद्यादायनी मानी जाती है !! ऐसी देवी की, इस पूजा में, जो साथ दिया वह दागी है ! आशीर्वादों का नहीं, वह, कठोर श्राप का भागी है !! ऐसी मनोव्यस्था से बाहर निकल, आओ करें सद्बुद्धि  की कामना ! मन-मंदिर में स्थिर बैठ, करें हम, माँ की आराधना!! करें हम, माँ की आराधना - २ 

मरने का रहस्य

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सुनो ओ प्यारे जान लो, मरने का रहस्य पहचान लो! दुनिया से यह तेरी, माया-मोह का अंत है ! इसके अगले क्षण ही, चित्त की शांति अनंत है !! पाने का कोई लोभ नहीं, खोने का भी क्षोभ नहीं ! तभी बारम्बार विशाल, मरने का देता मिशाल !! परमसुख के आस्वादन हेतु, चलो हम हर-रोज मरें ! प्रज्ञा की मुखाग्नि देकर, तृष्णा का हम दाह करें !! फिर हर सुबह की नयी किरण, नयी-नयी तरंगें लायेंगी ! नवजन्मे बच्चे की भांति, तुझमें उमंगें भर जाएंगी !! फिर, तुझसे बड़ा कोई संत न होगा, तेरे सुख-शांति का अंत न होगा ! सुनो ओ प्यारे जान लो, मरने का रहस्य पहचान लो !! मरने का रहस्य पहचान लो, मरने का रहस्य पहचान लो.....

सच्चा सच्च

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युगों से यात्रा शुरू है तेरी, यह जन्म भी इसका हिस्सा है! इससे पहले जाने कितने, जन्मों का तेरा किस्सा है !! समय की चकरी घूम रही, दुःख-सुख धूप और छाँव हैं ! तेरे इस सफर में साकी, मृत्यु एक पड़ाव है !! इस जनम का नाता-रिश्ता, यही समाप्त हो जाएगा ! तेरी अगली यात्रा में, साथ कोई नहीं आएगा !! यह शरीर जिसे तू 'मैं' कहता है, वो भी मिट्टी में मिल जाएगा ! अपने कर्मों के अनुरूप, इक नया शरीर तू पायेगा !! फिर कौन अपना है, कौन पराया, इस गूढ़ रहस्य को जान लो ! माया-मोह के बंधन से उठ, कर्म-भेद पहचान लो !! बार-बार कहता बिशाल, नित-ध्यान करो, और योग करो ! अपने इस मानव जीवन का, अच्छे से उपयोग करो !! अच्छे से उपयोग करो... तुम अच्छे से उपयोग करो....!!

दीवाली - 2014

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Heidelberg में आज दीवाली, मिलकर हम मनाएंगे ! घंटो-तक हमसब मिलकर, मस्ती के दीये जलाएंगे !! इन दीपों का प्रकाश, खुशियों की लहर फैलायेगा ! अंधियारा सबके मन-मंदिर का, क्षण-भंगुर हो जायेगा !! ठुमका, गान, बाज भी होगा, DJ का आगाज भी होगा ! धड़कन-धड़कन थिड़केगा ! साँसों की अंगराई से, रोम-रोम आज फिड़केगा !! दिल से दिल का तार भी होगा ! मस्ती के इस वारिश में, छुपी नजरों से वार भी होगा !! उन वारों की चिंगारी, दिल के दीये जलाएंगी ! मन-मंदिर को क्षण-भर में, प्रकाशमान कर जाएंगी !! आओ जलाएं, प्यार का दीप ! मानवता के सार का दीप ! खुशियाँ और सौहार्द का दीप ! निजकर्मों से पुरुषार्थ का दीप ! इन दीपों  के जगमग से, सब भाव-विभोर हो जाएंगे ! Heidelberg  में आज दीवाली, मिलकर हम मनाएंगे… घंटो तक हमसब मिलकर, मस्ती के दीये  जलाएंगे ।।

ज्ञान-चक्षु

जन्म होने पे सब पाते, केवल सांसे और धडकन! भूल इन्हे हम पिरो देते हैं, रिश्तोँ का बंधन !! किसी का बेटा, किसी का भांजा, किसी का नाती-पोता ! चढ़ा चश्मा इन रिश्तों का, सब जीवन ज्योत है खोता!! राग-द्वेष से विरत हर बच्चा, होता निर्मल निश्छल ! अपने पराये का भेद न जाने, ढूंढता करुणा पल-पल !! अब बूँद-बूँद माया-मोह का, जो घूंट लिया वो क्षण-क्षण ! इस काल-चक्र की चकरी में, भुलाया सांस और धड़कन !! आमूढ़ संस्कारों के परत तले, फ़िर दबने लगा अंतर्मन ! और द्वेष-राग से दहक उठा, तृष्णा से भरे ये तन-मन !! ये राग-द्वेष सुखी लकड़ी के भाँती, जलाये शरीर के इंजन ! तृष्णा है पेट्रोल ओ साकी, दूर रख ऐसे  ईंधन !! चाहे बचपन हो या यौवन हो, या बुढ़ापे की साया ! प्रियतमा से भी प्यारी होती, सबकी अपनी काया !! (इसके) नश्वरता का मूल समझ, देख ! क्या खोया क्या पाया! ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का, की, न फटक सके कोइ माया !!  न फटक सके कोइ माया साखी,  न फटक सके कोइ माया!!

प्यार का मौसम

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लो फिर से आ गया है, प्यार का ये मौसम ! भौरों का कलियों से, दिलदार का ये मौसम !! समाँ धूप में सनी है, हवा में कनकनी है ! भौरें भवंर रहे हैं, कलियाँ सवंर रही हैं! समय की इस घड़ी में, जवाँ दिल धड़क रहे हैं ! दिलवर को याद करके, अंग-अंग फड़क रहे हैं !! दिल की धड़कनों का, आयाम जड़ रहा है ! इन्हे व्यक्त करने खातिर, हर शख्स होठों का, व्यायाम कर रहा है !! फिर से आ गया है, प्यार का ये मौसम ! भौरों के कलियों से, दिलदार का ये मौसम !! दिलदार का ये मौसम, प्यार का ये मौसम !!!!

पुरवाई

आते-जाते बादल में, रात की चाँदनी चादर में! विभोर हो मन-मद्द नाच उठा, स्पर्श हवा का पाया जब, इस सावन के पुरवाई का!! जूही, चमेली, रातरानी की खुशबू, जाने कहाँ से चलकर आयी थी! सुगंध इनकी, साँसों के, हर निवाले में समायी थी!! सुबह हुई जब आँख खुली, आलस्य का वैभव छाया था! ये पूर्वा बयार, अंग-अंग के, भूले पीड़े को जगाया था!! जब बिस्तर छोड़ सैर को निकला, मिजाज हुआ अंगराई का! स्पर्श हवा का पाया जब, इस सावन की पुरवाई का!! क्षण धूप हुआ, क्षण छाँव हुआ, सोंधी मिट्टी की खुशबू से, आच्छादित था गाँव हुआ! रोम-रोम हर्षाया तब, धुन सरगम का पाया जब, रिमझिम बूंदों की शहनाई का!! विभोर हो मन-मद्द नाच उठा, स्पर्श हवा का पाया जब, इस सावन के पुरवाई का!!

गणेश पूजा

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गणेश-चतुर्थी के शुभ अवसर पे, विशाल को आज यही है सुझा! तन-मन ज्ञान और निष्ठां से, घर-घर में हो श्री गणेश की पूजा!! मुखड़ा है गजराज की भाँती, पेट ऐसा की ढँक गया छाती! पर हीनता का कोई बोध नहीं, सुन्दर दिखने का लोभ नहीं!! (जबकी) आज फ़िल्मी धुन पे गाना बजा, हम मूर्ति पूजन करते हैं! और पूजा करने के खातिर, हम  घंटो तक सवंरते हैं!! आज सुशिक्षित होने का लेप लगा, हम ऐसे अन्धकार में जी रहे हैं! मानो अमृत-प्याली  में, ओ साकी, विष हलाहल पी रहे हैं!! जब वे केवल बालक थे, माँ के आज्ञा के पालक थे, सर कलम कर डाला पिता ने इनकी, पर नहीं दिखाया क्षोभ तनिक भी! पूजनीय थी ऐसी सहनशीलता, आओ आज जगाएं इसे हम भी!! ब्रम्हांड दिखा इन्हें मात-पिता में, ये परम सत्य के शोधक हैं! विवेक, बुद्धि और ज्ञान रूप में, रिद्धि-सिद्धि के बोधक हैं!! रूप-जाल को तोड़ जो प्राणी, इन  गुणों को अपनाता है! शुभ-अशुभ के भवंर से उठ, अपना  अंतर्गणेश जगाता  है!! फिर शुभ-ही-शुभ होता जीवन में, लक्ष्मी को, साथ निरंतर भाता  है! ऐसा कीर्ति प...

उलझन

तह-ऐ-दिल में तेरी तमन्ना छुपाये, आरजू की तेरी सपनें संजोये! सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं, जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं!! जानता हूँ, तू मेरी किस्मत नहीं है, पर तुझे खोने की, मुझमें हिम्मत नहीं है!! दर्दों को भुलाकर, नींदों को सुलाकर, चाहत में तेरी, किया खुद को अर्पण! जब से तुने मुझसे, नजरें मिलायी, नज़रों को तेरी, बनाया मैं दर्पण!! फिर, हर फड़कन तेरे नाम का चिंगारी लाया, हर धड़कन तेरी चाहत को जगाया!! मुह्हबत में तेरी हुआ बावला मैं, समझ न सका तेरी उलझी पहेली! (जबकी) तेरी बेवफाई और तिर्या-चरित्र से, हर रोज चेतायी, मेरी वो सहेली!! पर जब-जब कहती वो, "तेरे लायक नहीं मैं", मेरे दिल ने पूछा, "क्या अपना नायक नहीं मैं"!! दिल के इस कथन पे, चहकता चला मैं! तेरे लटों की डगर पे, बहकता चला मैं!! मूरत को तेरी, मन-मंदिर में बसाये, तृष्णा की ज्वाला, इस कदर है जलाया! की सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं, जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं... जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं... जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...

राखी

उमड़ा भाई-बहन का प्यार, आया राखी का त्यौहार! गाँठो पे गाँठ जुड़ेगा आज, कहलाता यह रिश्तों का ताज!! बहना ने आशीर्वादों से, राखी का थाल सजाया है! कपूर की लौ की भाँती, उजियारा मन में छाया है!! पूर्णिमा सी श्वेत हृदय से, कुमकुम-चावल का चन्दन! लगकर भाई के ललाट पे, करते वैभव का अभिनन्दन!! अक्षत- पवित्र-करुणामयी, कच्चा धागा बाँधी हो! रक्षा करते हैं हर क्षण, चाहे तूफान या आंधी हो! भाव-विभोर हो आज विशाल, जोड़ा है, वचनों का तार! रक्षा में तेरी ओ बहना, जीवन भी देंगे हम वार!! जीवन भी देंगे हम वार.... जीवन भी देंगे हम वार....

यथार्थ-दर्शन

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तन-मन  के गांठों को तोड़, व्याकुलता का दामन छोड़! जब नितांत प्रज्ञा जगाओगे, यथार्थ-दर्शन को पाओगे!! इस मतवाले चित्त पे आते-जाते, संस्कारों का बोध करो! समता रख इनकी लहरों में, विकारों का निरोध करो!! क्रोध, ईर्ष्या और काम-वासना, विकारों के मूल हैं भाई! इनसे दूर रहने में ही, हमसब की है चतुराई!! विकार जगें जब चित्तमन पे, सजग हो इनको जानो तुम! प्रतिक्रया किये बिना इनकी, नश्वरता को पहचानो तुम!! जो उत्पन्न हुआ है, नष्ट भी होगा, यह गति समझ बढ़ जाओगे! इन दु:संस्कारों  का तब ही, समूल नाश कर पाओगे!! जग के हर-एक क्रिया-कर्म में, नश्वरता का मूल समझ, सकर्म कर बढ़ते जाओ तुम! ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का,  उजियारा जग में लाओ तुम!!