Tuesday, September 7, 2010

आत्म-संवाद










चल-चला-चल, चल-चला-चल,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

निष्ठा को अपनी ढाल बनाकर,
तत्परता से अपनी चाल रमाकर!
मन रूपी अश्व को दृढ़ता से थामे,
अपनी समझ के दिशा-निर्देश में!
जीवन के रथ पे हो सवार,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

विफलताओं पे रूककर, विचार न कर,
(किसी) माया का आमंत्रण, स्वीकार न कर!
क्षणिक सुखों में, तुझे न रमना है,
थक कर भी, कभी न थमना है!
हँस-हँस के घुटक, पथ के हलाहल,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

सफलता की छांव, जब-कभी भी पाये,
तेरे कर्म की चकरी, रुक न जाये!
नित-कर्मों की लौ में, खुद को तपाकर,
हर सफलता की मिसाल बना तू!
दृढ-संकल्प और अथक प्रयास से,
इस बिशाल को, विशाल बना तू!!

चल-चला-चल, चल-चला-चल!
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!