Sunday, November 27, 2016

आत्मबोध - III

मन-मंदिर के अंतःकण में,
घोर विचलन के इस क्षण में !
विशाल को नहीं सूझ रहा,
किससे और क्यों वो जूझ रहा !!

लोक-लाज की छाया में,
व् कलियुग की काली माया में !
सब कहते "तू कर ले शादी",
मिल जायेगी जीवनसाथी !!

सबके पास एक पार्थ हैं, (पार्थ = candidate)
सबका अपना स्वार्थ हैं !
कोई दहेज़ से तौल रहा है,
कोई सौंदर्य से मोल रहा है !!

नित-प्रतिदिन वर्षों से में,
इक ही बात बोल रहा हूँ !
क्षण-प्रतिक्षण, अपने जीवन से,
जीने के राज खोल रहा हूँ !!

चाह नहीं नए रिश्तों के,
बंधन में बँधता जाऊं।
चाह नहीं शादी करके,
एकांकी परिवार बनाऊं !!

आधा जीवन बीत चुका,
आधा जीवन ही बाकी है !
मेरे जीवनपथ पे मिलनेवाले,
जन-जन मेरे साकी हैं !!

माया-मुक्त हो चलते जाना,
मेरे जीवन का भावार्थ है !
बंधन-मुक्त हो दुनिया त्यागूँ ,
मेरा यही स्वार्थ है !!

मेरा यही स्वार्थ है......
बस मेरा यही स्वार्थ है......!!

Thursday, December 17, 2015

अर्थ हुआ कुअर्थ- 'दिवाली'


अब समझने का न रहा समर्थ,
बदल चुका दिवाली का अर्थ !

आज ढोल-नगाड़े बजते हैं,
दीपों से आँगन सजते हैं !
ये आशय तो सूझ रहा है,
पर विशाल कहीं और जूझ रहा है !!

पश्चिम में नववर्ष मानते,
दक्षिण  में हरिकथा सुनाते !
काली पूजा पूरब में करते,
लक्ष्मी पूजा उत्तर में !!

दिवाली उत्सव का भारत में,
कारण हुआ अनेक !
तारीख-तरीका इन जश्नों का,
फिर कैसे हुआ एक !!

मानसून अब लौट चला है,
सील अभी भी भारी है !!
सूरज की गर्मी से अब,
कीटों का विस्तार जारी है !!

इस उत्सव की छाया में,
विभिन्न मान्यताओं की माया में !
सब साफ़-सफाई करते हैं !
घर-आँगन और गलियारों की,
रंग पुताई करते हैं !!

अनेकों कीट  मरते हैं,
कितनों के घर उजड़ते हैं !

फिर, दिवाली की जज्बात में,
अमावस्या की काली रात में !
ढोल और नगाड़े बजाकर,
हर तरफ दीये  जलाकर !

उन बेघर कीटों को हम,
प्रकाश दिखा रिझाते थे !
दीयों के पास उन्हें बुलाकर,
दीयों से उन्हें जलाते थे !!

नये फैशन के चकाचौंध में,
और व्यस्तता की औंध में !
ढोल-नगाड़ों की जगह,
अब खूब पटाखे जलते हैं !
जिससे रोगी, वृद्ध और परिंदे,
सांस लेने को तड़पते हैं !!

दीयों की जगह अब घर-घर में,
इलेक्ट्रिक बल्ब लटकते हैं !
कीट-पतंगें जिनके इर्द-गिर्द,
पूरी रात फटकते हैं,
पर अक्सर नहीं मरते हैं !!

दिवाली के इस उत्सव में,
अपना भी नुक्सान करें,
गैरों का भी नुक्सान करें !
फिर, विकसित और शिक्षित होने का,
कैसे हम गुमान करें !!

अब समझने का न रहा समर्थ,
बदल चुका  दिवाली का अर्थ…
बदल चुका दिवाली का अर्थ…

Friday, May 1, 2015

आज की राज














मानस! क्यूँ आकुल है तू !
किस कारण व्याकुल है तू !!

तू जल रहा है राग में,
कामना की आग में !
रिद्धि-सिद्धि के लिए,
इस आग को तू रोक ले !!

ध्येय अपना साधकर,
उत्तेजना को बांधकर !
लक्ष्य के प्रयास में ,
तू पूरी ऊर्जा झोंक दे !!

यह पल अभी जो आया है,
वापस कभी न आएगा !
जिंदगी के राह का,
इतिहास बन रह जाएगा !!

दिन-प्रतिदिन ध्यान कर,
जीने की कला सीख तू !
कर्मों के कलम से अभी,
इतिहास अपना लिख तू !!

कभी भी अधीर हो,
भाग्य पे रोना नहीं !
विलासिता की चाह में
समय व्यर्थ खोना नहीं !

यह समय बहुत बलवान है,
जीवन की यही जान है !

इस समय अगर तू,
कर्मोन्मुख  हो जाएगा!
जीवन के डगर पे,
रिद्धि-सिद्धि पायेगा !!

रिद्धि-सिद्धि पायेगा, तू
रिद्धि-सिद्धि पायेगा.....!!

Saturday, February 21, 2015

आधुनिक शिवपूजा- एक पाप










आज विशाल जो सोच रहा है,
कहने में संकोच रहा है !

लोगों को शायद तनिक न सुझा,
क्यों होती है शिव की पूजा !
क्या होता है शिव का अर्थ,
क्यों पूजा-पाठ सब रहा व्यर्थ !!

देकर दुनिया को अमृत,
कहते हैं विषपान किया !
विष को कंठ में धारण करके,
नीलकंठ का नाम लिया !!

कहता विशाल, सोचो-जानो,
विष के अवयवों को पहचानो !
काम-क्रोध, लोभ और माया,
उसी विष की हैं, प्रतिच्छाया !!

जो कोई इन अवयवों को,
काबू में रखना सीख जाता है !
शिव-ललाट पे चाँद के भाँती,
शीतलता, मुख पे पाता है !!

उसके जीवन से हर क्षण,
मैत्री की धार निकलती है !
जैसे गंगा, शिव के सर से,
निरंतर प्रफुस्टित होती है !!

गले में लिपटा हो भुजंग,
फिर भी, भयभीत नहीं होता है !
कितना भी गहन संकट आये,
संतुलन कभी नहीं खोता है !!

कैलाशपति शिव-शंकर के भाँती,
जो कोई निरंतर ध्यान करे !
प्रज्ञा रुपी तीसरी नेत्र जगाकर,
स्वयं का कल्याण करे !!

महंगाई के इस चढ़ते दौर में,
हम मूर्ति का दुग्ध-स्नान कराते !
अंधभक्ति में, विष का प्रतीक,
बेल-पत्र, धतूर और भांग चढ़ाते !!

पूरा दिन, लाउडस्पीकर में,
शिव-महिमा का गुणगान किया !
पर शिव-गुणों को अपनाने खातिर,
क्षण-मात्र भी नहीं ध्यान किया !!

काम-क्रोध की आग में जलकर,
क्षीण हो रही सहनशीलता !
लोभ-मोह के बंधन में बंधकर,
खो रहे हैं हम धीरता !!

रग-रग में दौड़ते इन विषों से,
जब मन-मंदिर में हो रहा हो दंगल !
फिर, भक्ति को कर्म-काण्ड बनाकर,
कैसे होगा किसी का मंगल !!

शिव का अर्थ की 'मंगल' होता!

जो इंसान, जिस क्षण भी,
शिव का गुण अपनाता है !
वही क्षण उसके लिए,
मंगलकारी हो जाता है !!

कर्म-काण्ड से बाहर आओ प्यारे,
शिव का गुण अपनाओ प्यारे !!
शिव का गुण अपनाओ प्यारे....

Saturday, February 7, 2015

प्यार की खुमार (एक लड़की का)













फिर आया है प्यार का मौसम,
प्रियवर से दिलदार का मौसम !!
तुझसे दिल की तार हुई है,
खुशियों की बौछार हुई है !!

सुरूर तेरी चाहत का,
इस कदर छाने लगा है !
हर-पल, हर-जगह,
तू हीं नजर आने लगा है !!

वीरान थी ये जिंदगी,
तेरे आने से पहले !
तेरी साँसों का, मेरी साँसों में,
समाने से पहले !!

बन के जादू , मेरी रूह में,
समाने लगा है तू !
बेचैन करके हर लम्हा।
तड़पाने लगा है तू !!

तुझसे मिलने की हर आहट से,
अंग-अंग फड़कता है !
संग होने के एहसास से,
जेहन-व्-दिल धड़कता है !!

हर-क्षण तेरी ख्यालों में,
मैं खोयी रहती हूँ !
तेरे सपनों के साये में ही,
सोयी रहती हूँ !!

दिल की बगिया में, ये मौसम,
अजीब बहार लायी है !
कहता विशाल, ओ पगली !  तुझपे,
प्यार की खुमार छायी है !!

प्यार की खुमार छायी है !!
तुझपे प्यार की खुमार छायी है !!

Wednesday, February 4, 2015

प्यार की खुमार (एक लड़के का)









इस वसंत-वहार की बेला में,
गुलों-गुलजार की मेला में !
प्यार से प्यारे, तेरे प्यारे नैना,
दे प्यार ले लिए, मेरे रैना !!

तेरे प्यार की प्यारी सौदेबाजी,
प्यारा-प्यार सिखाती है !
चुपके-चुपके बड़े प्यार से,
मुझ प्यारे को रिझाती है !!

बंद-पलकों से, शरमाकर,
मुख-मंडल पे लाली लाकर !
आगोश में जब तू आती है,
पूरकता का बोध कराती है !!

तेरी मखमली बाहों का,
आलिंगन जब-जब पाता हूँ !
भुलाकर खुद की साँसों को,
तेरी साँसों में, रम जाता हूँ !!

उन साँसों की गर्माहट,
साथ तेरे होने की आहट,
अंग-अंग फड़काता है !
स्पर्श तेरे कोमल होठों का,
पागल-दीवाना कर जाता है !!

दिल की बगिया में, ये मौसम,
प्यार का सावन लाया है !
कहता विशाल, ओ पगले तुझपे,
खुमार प्यार का छाया है !!

खुमार प्यार का छाया है....
खुमार प्यार का छाया है !!

Friday, January 23, 2015

आधुनिक सरस्वती पूजा - एक पापकर्म














मन अपना आज विचलित पाया,
जैसे निगल रही हो काली साया !
लोगो को अब नहीं है सूझा,
कैसे कर रहे हम सरस्वती पूजा !!


जो पठन-पाठन में हैं बागी,
पढ़ने की इक्छा कभी न जागी !
सरस्वती पूजा के खातिर, उन्होंने ही,
महीनो घूमकर चन्दा मांगी !!


गली-गली में मूर्ति लाये,
फूल-माला से खूब सजाये !
मूर्ति को दुल्हन बनाये,
पर माँ की छवि, देख न पाये !!


फ़िल्मी धुनों पे गाना बजा,
झांकी लेकर चलते हैं !
मदिरा के मद्य में मत्त हो,
असुरों की तरह उछलते हैं !!


युवाओं के मन-मंदिर में,
यह कैसा अन्धकार है छाया !
विशाल कुंठित हो सोच रहा,
क्या यह कलियुग की है माया !!


"स्वयं का सार" आलेखन करती,
माँ सरस्वती कहलाती है !
परम-ज्ञान की द्योतक है ये,
विद्यादायनी मानी जाती है !!


ऐसी देवी की, इस पूजा में,
जो साथ दिया वह दागी है !
आशीर्वादों का नहीं, वह,
कठोर श्राप का भागी है !!


ऐसी मनोव्यस्था से बाहर निकल,
आओ करें सद्बुद्धि  की कामना !
मन-मंदिर में स्थिर बैठ,
करें हम, माँ की आराधना!!


करें हम, माँ की आराधना - २ 

Monday, January 19, 2015

मरने का रहस्य













सुनो ओ प्यारे जान लो,
मरने का रहस्य पहचान लो!

दुनिया से यह तेरी,
माया-मोह का अंत है !
इसके अगले क्षण ही,
चित्त की शांति अनंत है !!

पाने का कोई लोभ नहीं,
खोने का भी क्षोभ नहीं !
तभी बारम्बार विशाल,
मरने का देता मिशाल !!

परमसुख के आस्वादन हेतु,
चलो हम हर-रोज मरें !
प्रज्ञा की मुखाग्नि देकर,
तृष्णा का हम दाह करें !!

फिर हर सुबह की नयी किरण,
नयी-नयी तरंगें लायेंगी !
नवजन्मे बच्चे की भांति,
तुझमें उमंगें भर जाएंगी !!

फिर, तुझसे बड़ा कोई संत न होगा,
तेरे सुख-शांति का अंत न होगा !
सुनो ओ प्यारे जान लो,
मरने का रहस्य पहचान लो !!

मरने का रहस्य पहचान लो,
मरने का रहस्य पहचान लो.....

Wednesday, November 19, 2014

सच्चा सच्च








युगों से यात्रा शुरू है तेरी,
यह जन्म भी इसका हिस्सा है!
इससे पहले जाने कितने,
जन्मों का तेरा किस्सा है !!

समय की चकरी घूम रही,
दुःख-सुख धूप और छाँव हैं !
तेरे इस सफर में साकी,
मृत्यु एक पड़ाव है !!

इस जनम का नाता-रिश्ता,
यही समाप्त हो जाएगा !
तेरी अगली यात्रा में,
साथ कोई नहीं आएगा !!

यह शरीर जिसे तू 'मैं' कहता है,
वो भी मिट्टी में मिल जाएगा !
अपने कर्मों के अनुरूप,
इक नया शरीर तू पायेगा !!

फिर कौन अपना है, कौन पराया,
इस गूढ़ रहस्य को जान लो !
माया-मोह के बंधन से उठ,
कर्म-भेद पहचान लो !!

बार-बार कहता बिशाल,
नित-ध्यान करो, और योग करो !
अपने इस मानव जीवन का,
अच्छे से उपयोग करो !!

अच्छे से उपयोग करो...
तुम अच्छे से उपयोग करो....!!

Wednesday, October 22, 2014

दीवाली - 2014










Heidelberg में आज दीवाली,
मिलकर हम मनाएंगे !
घंटो-तक हमसब मिलकर,
मस्ती के दीये जलाएंगे !!

इन दीपों का प्रकाश,
खुशियों की लहर फैलायेगा !
अंधियारा सबके मन-मंदिर का,
क्षण-भंगुर हो जायेगा !!

ठुमका, गान, बाज भी होगा,
DJ का आगाज भी होगा !
धड़कन-धड़कन थिड़केगा !
साँसों की अंगराई से,
रोम-रोम आज फिड़केगा !!

दिल से दिल का तार भी होगा !
मस्ती के इस वारिश में,
छुपी नजरों से वार भी होगा !!

उन वारों की चिंगारी,
दिल के दीये जलाएंगी !
मन-मंदिर को क्षण-भर में,
प्रकाशमान कर जाएंगी !!

आओ जलाएं, प्यार का दीप !
मानवता के सार का दीप !
खुशियाँ और सौहार्द का दीप !
निजकर्मों से पुरुषार्थ का दीप !

इन दीपों  के जगमग से,
सब भाव-विभोर हो जाएंगे !
Heidelberg  में आज दीवाली,
मिलकर हम मनाएंगे…
घंटो तक हमसब मिलकर,
मस्ती के दीये  जलाएंगे ।।

Friday, July 4, 2014

ज्ञान-चक्षु

जन्म होने पे सब पाते, केवल सांसे और धडकन!
भूल इन्हे हम पिरो देते हैं, रिश्तोँ का बंधन !!

किसी का बेटा, किसी का भांजा, किसी का नाती-पोता !
चढ़ा चश्मा इन रिश्तों का, सब जीवन ज्योत है खोता!!

राग-द्वेष से विरत हर बच्चा, होता निर्मल निश्छल !
अपने पराये का भेद न जाने, ढूंढता करुणा पल-पल !!

अब बूँद-बूँद माया-मोह का, जो घूंट लिया वो क्षण-क्षण !
इस काल-चक्र की चकरी में, भुलाया सांस और धड़कन !!

आमूढ़ संस्कारों के परत तले, फ़िर दबने लगा अंतर्मन !
और द्वेष-राग से दहक उठा, तृष्णा से भरे ये तन-मन !!

ये राग-द्वेष सुखी लकड़ी के भाँती, जलाये शरीर के इंजन !
तृष्णा है पेट्रोल ओ साकी, दूर रख ऐसे  ईंधन !!

चाहे बचपन हो या यौवन हो, या बुढ़ापे की साया !
प्रियतमा से भी प्यारी होती, सबकी अपनी काया !!

(इसके) नश्वरता का मूल समझ, देख ! क्या खोया क्या पाया!
ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का, की, न फटक सके कोइ माया !!

 न फटक सके कोइ माया साखी,  न फटक सके कोइ माया!!

Wednesday, January 22, 2014

प्यार का मौसम










लो फिर से आ गया है,
प्यार का ये मौसम !
भौरों का कलियों से,
दिलदार का ये मौसम !!

समाँ धूप में सनी है,
हवा में कनकनी है !
भौरें भवंर रहे हैं,
कलियाँ सवंर रही हैं!

समय की इस घड़ी में,
जवाँ दिल धड़क रहे हैं !
दिलवर को याद करके,
अंग-अंग फड़क रहे हैं !!

दिल की धड़कनों का,
आयाम जड़ रहा है !
इन्हे व्यक्त करने खातिर,
हर शख्स होठों का,
व्यायाम कर रहा है !!

फिर से आ गया है,
प्यार का ये मौसम !
भौरों के कलियों से,
दिलदार का ये मौसम !!

दिलदार का ये मौसम,
प्यार का ये मौसम !!!!

Monday, October 8, 2012

पुरवाई


आते-जाते बादल में,
रात की चाँदनी चादर में!
विभोर हो मन-मद्द नाच उठा,
स्पर्श हवा का पाया जब,
इस सावन के पुरवाई का!!

जूही, चमेली, रातरानी की खुशबू,
जाने कहाँ से चलकर आयी थी!
सुगंध इनकी, साँसों के,
हर निवाले में समायी थी!!

सुबह हुई जब आँख खुली,
आलस्य का वैभव छाया था!
ये पूर्वा बयार, अंग-अंग के,
भूले पीड़े को जगाया था!!

जब बिस्तर छोड़ सैर को निकला,
मिजाज हुआ अंगराई का!
स्पर्श हवा का पाया जब,
इस सावन की पुरवाई का!!

क्षण धूप हुआ, क्षण छाँव हुआ,
सोंधी मिट्टी की खुशबू से,
आच्छादित था गाँव हुआ!
रोम-रोम हर्षाया तब,
धुन सरगम का पाया जब,
रिमझिम बूंदों की शहनाई का!!

विभोर हो मन-मद्द नाच उठा,
स्पर्श हवा का पाया जब,
इस सावन के पुरवाई का!!

Tuesday, September 18, 2012

गणेश पूजा











गणेश-चतुर्थी के शुभ अवसर पे,
विशाल को आज यही है सुझा!
तन-मन ज्ञान और निष्ठां से,
घर-घर में हो श्री गणेश की पूजा!!

मुखड़ा है गजराज की भाँती,
पेट ऐसा की ढँक गया छाती!
पर हीनता का कोई बोध नहीं,
सुन्दर दिखने का लोभ नहीं!!

(जबकी)
आज फ़िल्मी धुन पे गाना बजा,
हम मूर्ति पूजन करते हैं!
और पूजा करने के खातिर,
हम  घंटो तक सवंरते हैं!!

आज सुशिक्षित होने का लेप लगा,
हम ऐसे अन्धकार में जी रहे हैं!
मानो अमृत-प्याली  में, ओ साकी,
विष हलाहल पी रहे हैं!!


जब वे केवल बालक थे,
माँ के आज्ञा के पालक थे,
सर कलम कर डाला पिता ने इनकी,
पर नहीं दिखाया क्षोभ तनिक भी!
पूजनीय थी ऐसी सहनशीलता,
आओ आज जगाएं इसे हम भी!!

ब्रम्हांड दिखा इन्हें मात-पिता में,
ये परम सत्य के शोधक हैं!
विवेक, बुद्धि और ज्ञान रूप में,
रिद्धि-सिद्धि के बोधक हैं!!

रूप-जाल को तोड़ जो प्राणी,
इन  गुणों को अपनाता है!
शुभ-अशुभ के भवंर से उठ,
अपना  अंतर्गणेश जगाता  है!!

फिर शुभ-ही-शुभ होता जीवन में,
लक्ष्मी को, साथ निरंतर भाता  है!
ऐसा कीर्ति पाता है जग में, की उसका
हर रूप पूजनीय हो जाता है!!

वह स्वयं गणेश  बन जाता है!!
वह स्वयं गणेश  बन जाता है....



Saturday, September 1, 2012

उलझन

तह-ऐ-दिल में तेरी तमन्ना छुपाये,
आरजू की तेरी सपनें संजोये!
सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं,
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं!!

जानता हूँ, तू मेरी किस्मत नहीं है,
पर तुझे खोने की, मुझमें हिम्मत नहीं है!!

दर्दों को भुलाकर, नींदों को सुलाकर,
चाहत में तेरी, किया खुद को अर्पण!
जब से तुने मुझसे, नजरें मिलायी,
नज़रों को तेरी, बनाया मैं दर्पण!!

फिर, हर फड़कन तेरे नाम का चिंगारी लाया,
हर धड़कन तेरी चाहत को जगाया!!

मुह्हबत में तेरी हुआ बावला मैं,
समझ न सका तेरी उलझी पहेली!
(जबकी) तेरी बेवफाई और तिर्या-चरित्र से,
हर रोज चेतायी, मेरी वो सहेली!!

पर जब-जब कहती वो, "तेरे लायक नहीं मैं",
मेरे दिल ने पूछा, "क्या अपना नायक नहीं मैं"!!

दिल के इस कथन पे,
चहकता चला मैं!
तेरे लटों की डगर पे,
बहकता चला मैं!!

मूरत को तेरी, मन-मंदिर में बसाये,
तृष्णा की ज्वाला, इस कदर है जलाया!
की सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं,
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...

जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...

Friday, August 3, 2012

राखी

उमड़ा भाई-बहन का प्यार,
आया राखी का त्यौहार!
गाँठो पे गाँठ जुड़ेगा आज,
कहलाता यह रिश्तों का ताज!!

बहना ने आशीर्वादों से,
राखी का थाल सजाया है!
कपूर की लौ की भाँती,
उजियारा मन में छाया है!!

पूर्णिमा सी श्वेत हृदय से,
कुमकुम-चावल का चन्दन!
लगकर भाई के ललाट पे,
करते वैभव का अभिनन्दन!!

अक्षत- पवित्र-करुणामयी,
कच्चा धागा बाँधी हो!
रक्षा करते हैं हर क्षण,
चाहे तूफान या आंधी हो!

भाव-विभोर हो आज विशाल,
जोड़ा है, वचनों का तार!
रक्षा में तेरी ओ बहना,
जीवन भी देंगे हम वार!!

जीवन भी देंगे हम वार....
जीवन भी देंगे हम वार....

Wednesday, July 4, 2012

यथार्थ-दर्शन













तन-मन  के गांठों को तोड़,
व्याकुलता का दामन छोड़!
जब नितांत प्रज्ञा जगाओगे,
यथार्थ-दर्शन को पाओगे!!

इस मतवाले चित्त पे आते-जाते,
संस्कारों का बोध करो!
समता रख इनकी लहरों में,
विकारों का निरोध करो!!

क्रोध, ईर्ष्या और काम-वासना,
विकारों के मूल हैं भाई!
इनसे दूर रहने में ही,
हमसब की है चतुराई!!

विकार जगें जब चित्तमन पे,
सजग हो इनको जानो तुम!
प्रतिक्रया किये बिना इनकी,
नश्वरता को पहचानो तुम!!

जो उत्पन्न हुआ है, नष्ट भी होगा,
यह गति समझ बढ़ जाओगे!
इन दु:संस्कारों  का तब ही,
समूल नाश कर पाओगे!!

जग के हर-एक क्रिया-कर्म में,
नश्वरता का मूल समझ,
सकर्म कर बढ़ते जाओ तुम!
ज्योत जगा ज्ञान-चक्षु का,
 उजियारा जग में लाओ तुम!!

Friday, February 10, 2012

सबक (For girls)

इस बावली मौसम की बहार में,
रिमझिम सी बूंदों की फुहार में!
मद-मस्त हो तब मैं झूम रही थी,
उन्मुक्त गगन को चूम रही थी!!

तब बावला होकर मेरी चाह में,
चारो पहर मंडराता था!
मेरी हर अदाओं पे वो,
अपनी जान फरमाता था!!

घंटो-घंटो तक फोन किया,
सपनों का जाल बिछाया वो!
हर घड़ी मनोहर बात बनाकर,
मुझ पगली को रिझाया वो!!

जब यकीन किया उसके पौरुष पे,
उसके बातों का इकरार किया!
माने या न माने वो, फिर,
तहे-दिल से उसे प्यार दिया!!

परवाह किये बिना दुनिया की,
उसपे मैं जान बिछाती थी!
उसकी हर अदायें तब,
मुझ बावली को रिझाती थीं!!

मेरी वही सादगी वही तरुणा,
उसे अब नहीं भाति है!
जानें क्यूँ मुझसे मिलने से,
उसकी नजरें कतराती हैं!!

गह-विगह वह फोन लगाकर,
कहता है मुझे भूल रहा है!
सूना है आजकल वो बेवफा,
किसी और की बाँह में झूल रहा है!!

अब समझ चुकी इस 'प्यार' का अर्थ,
'सबक' इसे इक मान लिया है!
कर्मभूमि को जाऊँगी,
मैं भी अब ठान लिया है!!

अपनी जीवन को अब मैं,
ऐसा सफल बनाऊंगी की,
वो इक दिन पछतायेगा!

वो इक दिन पछतायेगा!
वो जरुर इक दिन पछतायेगा!!

Thursday, February 9, 2012

सबक (For boys)

इन खुशियों की पावन बेला में,
और दिलवालों की मेला में!
हम पास रहकर भी दूर हुए,
सब अरमान चकनाचूर हुए!!

मानो मुट्ठी में वो जैसे,
रेत की भांति फिसल गयी!
इस दुनियादारी की चक्की में,
मेरी अभिलाषा पिसल गयी!

धड़कन से ज्यादा प्यार दिया,
पल-पल उसका दिलदार किया!
पर जाने किस सजा में विधि ने,
आज ऐसा प्रहार किया!!

इक आहट मात्र, साथ होने की,
पूरकता का बोध कराती थी!
और यादें उसकी सीरत की,
नयी ऊर्जा देकर जाती थी!! 

फिर लग जाता नितकर्मों में,
बड़ी लगन से निशदिन पढता था!
इक ईष्ट की भांति सारी मेहनत, 
उसी को अर्पण करता था!!

सोचा था उसको भी शायद,
इंतज़ार है मेरा आने का!
किसी पावन घडी में आकर,
मेरा उसको अपनाने का!!

पर थाम लिया किसी और ने दामन,
देरी हो गयी आने में!
वक्त की नियति न समझा,
तभी बैठा हूँ महखाने में!!

घाव लगे इस आहत दिल को,
विशाल किसी तरह संभाल लिया!
पर दीवानों की, हर टोली के लिए,
इसे "सबक" का, है नाम दिया!!

दीवानों की, हर टोली के लिए,
इसे "सबक" का, है नाम दिया!
इसे "सबक" का, है नाम दिया!!....

Friday, December 9, 2011

आत्मबोध (II)

मैंने खुद से पूछा "तू कौन है?"
इस प्रश्न पे क्यूँ मौन है!!

इस हाड़-मांस की काया में,
और आमूढ़ मानवी माया में!
क्यूँ भटक रहा तू सालों-साल,
चल तोड़ अब ये माया जाल!!

हर दुःख की सीमा जान ले,
सच्चे सुख को तू पहचान ले!
दुःख भौतिक होता नित्य नहीं,
और भोग-विलास नित्य-सुख नहीं!!

तू ऊर्जा का इक स्रोत है,
हर-पल इक जलता ज्योत है!
जिस प्रान्त में भी जाए तू,
उजियारा बनकर छाए तू!!

बापू-सुबास तेरे मन में हों,
और भगत सिंह कण-कण में हों!
इन महात्माओं को तू जान ले,
अपने बुद्ध को पहचान ले!!

करुणा रगों में प्रवाह हो,
विवेक ही तेरा स्वभाव हो!
जब-जब कभी थककर थमे,
तू विकास का ही चिंतन करे!!

आलस्य अतिनिद्रा त्याग कर,
विश्वास से तू आगे बढ़!
पल-पल तेरी प्रज्ञा जगे,
हर-क्षण (तुझे) सुख-की-बेला लगे!!

जग का दिया जो तेरा नाम है,
वो तेरी नहीं पहचान है!
तू पांच-तत्वों का रूप है,
हर ईश्वर का स्वरुप है!!

जब भ्रान्ति जग का मिटाएगा,
तभी चित्त की शान्ति पायेगा!
इन रहस्यों को तू जान ले,
अपने आप को पहचान ले!!

अपने आप को पहचान ले,
तू अपने आप को पहचान ले...

Wednesday, November 30, 2011

अर्थ हुआ कुअर्थ - "दोस्ती"

पल-पल विचार इस मन में आये,
ये दोस्ती क्या है, कोई हमें बताये!

रिश्तों से परे ये पावन होता,
बीच जेठ में सावन होता!
ये आशय तो सूझ रहा है,
पर विशाल कहीं और जूझ रहा है!!

दोस्ती के साये में साकी,
क्यूँ जरुरी हुआ रोज फ़ोन मिलाना!
और झूठी हंसियों के खातिर,
केवल मनभावन ही बात सुनाना!!

तर्क-कुतर्क व् व्यर्थ की बातों में,
जो घंटों समय गवातें हैं!
राह-भूले इस चंचल मन के,
क्यूँ सच्चे दोस्त कहलाते हैं!!

इस दुनिया के चकाचौंध में,
हमने सच्ची-दोस्ती की तस्वीर भुलाया!
क्षणिक सुखों की चाहत में,
कर्मठता को नींद सुलाया!!

जब कोई चाहे, इसे जगाये,
वो, इस बन्दर-मन को नहीं भाता है!
मरू में जलबुंदों की भातीं,
वैसा दोस्त भुला दिया जाता है!!

इसमें कोई संकोच नहीं,
अब दूरगामी अपनी सोच नहीं!
अब समझने का न रहा समर्थ,
बदल रहा "दोस्ती" का अर्थ!!
बदल रहा "दोस्ती" का अर्थ.....

Sunday, October 16, 2011

अर्थ हुआ कुअर्थ

अब समझने का न रहा समर्थ,
बदल रहे शब्दों के अर्थ!

ब्राह्मण कुल में जन्मा मुर्ख भी,
अब परम-पूज्य हो जाता है!
हर लम्बी-दाढ़ी चोंगावाला,
साधु-संत कहलाता है!!

दूध के लिये गाय पालना,
मूर्खता का बोध कराता है!
पर कुत्तों के संग सुबह टहलना,
सामाजिक-प्रतिष्ठा दर्शाता है!!

फ़िल्मी डांस और गाना बजा,
हम मूर्ति-पूजन करते हैं!
मानव से अब कौन डरे,
भगवान् से भी नहीं डरते हैं!!

सत्य-अहिंसा व् चोरी नहीं करना,
हर मानव-धर्म का यही था कहना!
ये हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई,
सम्प्रदायों के नाम है भाई!!

शील-समाधि-ज्ञान-प्रज्ञा ही,
मूल-धर्म कहलाते थे!
इन्हें ही पालन करनेवाले,
धार्मिक माने जाते थे!!

सच्चाई के तरफ इशारा मात्र भी,
अब गांधीगीरी कहलाता है!
मानव-धर्म की चर्चा करनेवाला,
हास्य-पात्र बन जाता है!!

अब तो गोरी-चिकनी काया ही,
सुन्दरता की हुई परिभाषा!
देख बिशाल कैसी बदल रही है,
मानवता और धर्म की भाषा!!

अर्थ-कुअर्थ के भवंर में डूबे,
चित्त की सुन्दरता को भूल रहे!
अपने मतलब का अर्थ बना,  (व्याकुल हो)
हम अहंकार में झूल रहे !!
हम अहंकार में झूल रहे......!!-2

Friday, October 14, 2011

दादी का त्यौहार दादा का प्यार (करवाचौथ special)











ये करवाचौथ है फिर से आया,
संग प्यार का नया सौगात है लाया!
तेरे व्रत की आरती, स्पर्श चन्दन के,
नए गाँठ जोड़ते, अपने बंधन के!!

वो करवाचौथ की पहली साल,
जब तुझे देख मैं हुआ निहाल!
दुल्हन सी सजी, तब तू आगन में, चाँद देखने आयी थी,
तुझे देखकर चंदा भी, अपनी चांदनी पे इतरायी थी!!

कहने को अब है उमर ढली,
पर तू आज भी लगती वही कली!
मेरी जान है तू, अभिमान है तू,
मेरी धड़कन की पहचान है तू!!

तेरे दम पे ही चलता हूँ,
तेरे साँसों से-ही साँसे भरता हूँ!
तुने सालों-साल तक साथ निभाया,
धन्य हुआ जो तुझको पाया!!

तेरे बिन जीना न गवांरा है,
इस बुढ़ापे की इक तू ही सहारा है!
इस बुढ़ापे की  इक तू ही सहारा है....!!

Saturday, April 2, 2011

ShriRam Sir की Economics

सुबह हुई नींद से जागा,
बिस्तर छोड़ Class को भागा!
बरस रहे थे जहाँ Jokes & Comics,
देख इसे अंदाज किया मैं,
ये है शायद Shriram Sir की Economics!! 

यंहा शीला अक्सर आती है,
हंसियों के फव्वारे दे,
हमसब की नींद भगाती है! 

Indian Economics समझाने को,
Monetary Policy बतलाने को!
मनमोहन-तिवारी भी अक्सर,
यंहा साथ-साथ दिख जाते हैं!
और राज बता Zero -figure के,
मुस्कान सभी पे लाते हैं!!

Global-Economics के recession में,
Crisis के  serious discussion में!
Lehman-brothers जब आते हैं,
शकीरा भी साथ में लाते हैं!!

जहाँ Onion की बेदामी,
Inflation का चर्चा लाता है!
वहीं मुन्नी की बदनामी,
सबको विचलित कर जाता है!!

Economics के serious discussion में,
जहाँ बरस रहे हों Jokes और Comics!
बिन सोचे समझ लो प्यारे,
ये हैं ShriRam Sir की Economics !!-2

Monday, March 28, 2011

वो अनजानी सूरत









इस बेमौसम बरसात में,
जहाँ पत्ता-पत्ता झूम रहा है!
दहक उठा दीवाना दिल,
वो अनजानी नजरें ढूंढ़ रहा है!

जिनके पलकों के नीचे से,
गंगा-यमुना के भांति,
मदिरा की धार निकलती है!
जो घूंट पिला, इक दर्शन का,
इस बंजर को तृप्त कर देती है!!

पंखुरियों सी गाल गुलाबी,
बना देती बिन-पीये शराबी!
अनछुई वो ओठ सबनमी,
मिटा देती है सारी कमी!!

मोरनी सी बलखाती कमर पे,
जब काले बाल मंडराते हैं!
पल भर में इस दीवाने दिल को,
अनेकों सांप सूंघ जाते हैं!!

वो कुदरत की कोई सूरत है, या
सुन्दरता की मूरत है!
इस बेमौसम बरसात में,
उस सीरत की  जरुरत है,
उस सीरत की  जरुरत है!!

Wednesday, February 23, 2011

दीवानगी IAS की

कल तक इस तपते सूरज को,
बादल से छुपते जब देखा!
बावला हुआ मन यह सोचकर,
कैसी सुहानी मौसम लायी है मेघा!!

याद आया जब इस मौसम में,
Long-Drive पे जाता था!
गाना आये या न आये,
यारों के सुर में सुर लगाता था!!

खिड़की के बाहर से जब-जब,
ये मौसम मुझे रिझाती है!
कमरे के अन्दर से UPSC,
Syllabus का बोझ दिखाती है!!

IAS के रूप में इस जोगन ने,
ऐसी जोग लगायी है!
की लगता है अब जैसे,
Mathematics ही मेरी लुगाई है!!
व् Paali मेरी साली है!!

Paali मेरी साली है,
व् G.S. ही सखा-सहेली है,
कुल मिलाकर UPSC,
इक बड़ी अनबुझी पहेली है!!

IAS की ये कैसी, दीवानगी हमपे छायी है!
जिसके लिये हमने, सारी मस्ती ठुकराई है!!

ये कैसी दीवानगी हमपे छायी है!
की हमने सारी मस्ती ठुकराई है!!...:)

Saturday, October 9, 2010

Civil Services vs. Research

Civil Services और Research में,
हो रहा है युद्ध घनघोर!
बिशाल बेचारा समझ न पाये,
जाना है किस ओर!

Research के तरफ से जहाँ,
सुख-चैन की माया है!
Civil -services के शिविर में,
रास्ट्रीयता व् धर्म की छाया है!!

छोड़ शिविर उस मोहिनी (Research ) का,
Civil -services को आया है!
रास्ट्र-कल्याण के कारण हेतु,
योगी का भेष अपनाया है!!

सफलता की सावन बरसा, Research
कौतुहल मन को भींच रही है!
Easy life के सपने दिखा,
बेदर्दी से, अपनी ओर खिंच रही है!!

इस खिंचा-तानी के क्रम में,
आया है ऐसा असमंजस का मोड़!
की, बिशाल बेचारा समझ न पाये,
जाना है किस ओर!!
आखिर जाना है किस ओर!!

Tuesday, September 7, 2010

आत्म-संवाद










चल-चला-चल, चल-चला-चल,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

निष्ठा को अपनी ढाल बनाकर,
तत्परता से अपनी चाल रमाकर!
मन रूपी अश्व को दृढ़ता से थामे,
अपनी समझ के दिशा-निर्देश में!
जीवन के रथ पे हो सवार,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

विफलताओं पे रूककर, विचार न कर,
(किसी) माया का आमंत्रण, स्वीकार न कर!
क्षणिक सुखों में, तुझे न रमना है,
थक कर भी, कभी न थमना है!
हँस-हँस के घुटक, पथ के हलाहल,
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

सफलता की छांव, जब-कभी भी पाये,
तेरे कर्म की चकरी, रुक न जाये!
नित-कर्मों की लौ में, खुद को तपाकर,
हर सफलता की मिसाल बना तू!
दृढ-संकल्प और अथक प्रयास से,
इस बिशाल को, विशाल बना तू!!

चल-चला-चल, चल-चला-चल!
चल बिशाल, तू चल-चला-चल!!

Saturday, August 7, 2010

सीख

मास्को के airport पे,
जब बिन-पाँव इक नारी को देखा!
कन्द्रित हुवा मन यह सोचकर,
"कैसी है ये कुदरत की लेखा"!!

आँख में शूरमा, कान में बाली,
दमक रही थी, उसके ओठ की लाली!
सुन्दरता से परिपूर्ण वो काया,
झेल रही थी, इक काली साया!!

वो मजबूर सुंदरी बिन पाँव के,
नित-कर्म भी स्वयं न कर पाती होगी!
पल-पल की क्रिया-कर्म के लिये,
दुसरे की आस लगाती होगी!!

यह देख दशा मन पूछ रहा,
क्या है, उसके जीवन की भाषा!
ओ साकी, क्या तेरी तरह,
उसकी भी होगी कोई अभिलाषा !!

कुछ सीख कुदरत की इस छवि से,
अपंग है, फिर भी चमक रही है!
विष पी कर भी, यूँ दमक रही है!!

आज तू ऐसा शपथ ले ले,
न रोक सके, तुझे कोई माया!
तब तक कदम बढ़ाएगा तू,
जबतक सकुशल है तेरी काया!!

Saturday, July 31, 2010

प्यार का मंत्र (For youths who waste a huge portion of their energy and precious time being mad for love)

होता सफल प्यार वही,
जो इंतज़ार करे, इजहार नहीं!

निःसंकोच तुम प्यार करो,
पल-पल उसका दिलदार करो!
पर अपने चाहत की तृष्णा में,
उसकी मर्जी पे न वार करो!!

उसकी भी कुछ अपेक्षाएं होंगी,
सपने होंगे, चाहतें होंगी!
नित-कर्मों की लाठी थामें,
तुम, ऐसा कठिन उपवास करो!
की उसके हर सपने में, तुम ही,
केवल तुम ही वास करो!!

तेरा प्यार है इक अध्सोयी ज्वालामुखी (Half Sleeping Vocano ),
जो आधी जली है (from your side), आधी रुकी (of his/her side),
इस अधजली (ज्वालामुखी) पे न प्रहार करो!
चाहत की चिंगारी लगाकर,
दिलवर के जलने का इंतज़ार करो!!

जिस दिन तेरी चाहत उसे जलाएगी,
ये ज्वालामुखी (of your love) स्वयं फट जाएगी!
व्  निःशब्द बंधनों से जुड़े,
ऐसे अटटू प्यार की शैलाव लाएगी!
जिसमें कभी कोई कडवाहट,
चाहकर भी, नहीं ठहर पाएगी!!

अतः, होता सफल प्यार वही.
जो इंतज़ार करे, इजहार नहीं!!

Tuesday, June 29, 2010

मंजिल के मुसाफिर (Few words for those who could not qualify this year )











ओ! मंजिल के मुसाफिर,
वो बेला है आयी!
अपनी नींदिया भगा कर,
ख्वाबों से जगा कर!
जो कृष्णा है तेरी,
सोयी तृष्णा है तेरी!
उसे पाने के लिये, खुद को तैयार कर ले!
इस पावन घड़ी में (in this student life), जी-भर प्यार  कर ले!!

तेरी लक्ष्य को तेरी साधना में समाने,
तेरी नईया की टूटी पतवार बनाने!
समय की घड़ी, लो आज फिर आयी,
संग अपने तेरे-लिये, नयी रोशनी है लायी!
जिसे आज तू, स्वीकार कर ले,
इस पावन घड़ी में, जी-भर प्यार कर ले!!

भौरों की भांति, तू चंचल है तबतक,
अपनी मंजिल को, पायेगा न जबतक!
रास्ट्र व् समाज को  तुमसे, आशा है जैसी,
तुम्हारी अभिलाषा, भी शायद है ऐसी!
तू अपनी इस चाहत की, सच्ची-पहचान कर ले,
इस पावन घड़ी में, जी-भर प्यार कर ले!!
इस पावन घड़ी में, जी-भर प्यार कर ले!!

Thursday, June 3, 2010

अपना संस्कार "नारी-मूल्य"

इन पाश्च्या-देशों में, नारी-मूल्य का मान देख,
आंतकित करता मुझे, इक विचार!
इन पाश्च्य-जनों की तुलना में,
आखिर! कैसे धन्य है हमारा संस्कार!!

उम्र के इस नए पड़ाव में,
कौतूहलता की इस कठिन शैलाव में,
नव-पुरुषों की भाँती, नव-युवतियों में भी,
वैसे ही बदलाव आते हैं!
फिर,नव-पुरुषों का कोई प्रेम-प्रसंग, जहाँ सामाजिक-प्रतिष्ठा को दर्शाता है!
क्यूँ यही प्रसंग युवतियों के लिये, उनके चरित्र का मान बन जाता है!!

पुरुषों के मनोरंजन के खातिर,
युगों से वेश्यालय बहुचर्चित है!
फिर महिलाओं के लिये,
Polyandry होना क्यूँ वर्जित है??

हमारे संस्कार की काया में,
हम पुरुषों की रची माया में,
क्या नारी का जीवन मूल्यवान नहीं?
क्या उनमें मानवी जान नहीं?

लड़की को हम लक्ष्मी बोलते!
व् उनके सब अरमानों को कुचल,
शादी के वक्त, उनका मूल्य दहेज़ से तौलते!!
उन बेचारियों की बेबसी देख,
इस संस्कार की महानता पे, अब लज्जा आती है!

हम माँ काली की पूजा करते हैं?
या, उनके प्रलयंकारी छवि से डरते हैं?
दैव पुरुषों द्वारा, वर्ण-भेद का वो परिहास,
आखिर क्या बतलाता है?
क्या यह हमारे संस्कार के,
प्रभुता को दिखलाता है??
इक नारी का रंग सांवला (काला) होना,
क्यूँ  इक श्राप की भाँती है?
क्यूँ ये समाज उन्हें, आजीवन हीनता का एहसास दिलाती है??

धन्य हमारा संस्कार नहीं,
धन्य हैं  हमारे समाज की नारीयाँ!
धन्य हैं उनकी सहनशीलता!!

धन्य हैं उनकी सहनशीलता!
धन्य हैं उनकी सहनशीलता!!

Wednesday, April 21, 2010

जैव-तकनीकी (Biotechnology)









जैव-तकनीकी की दुनिया, निराली है बड़ी!
इसी के बुनियाद पे, ये दुनिया है खड़ी!!
इसमें होता है, जीवाणुओं का मेल!
जीवों के जीनों पे, चलता है खेल!!

जीवाणु करतें हैं, बड़ा बड़ा ड्रामा!
बड़ा interesting है, इनका कारनामा!!

Biotech से जुडी है, नयी technology की हर कड़ी!
जैव-तकनीकी की  दुनिया, निराली है बड़ी!
इसी के बुनियाद पे, ये दुनिया है खड़ी!!

इसमें चलता है, living cells पर research!
बड़े-बड़े scholars का, brain-energy होता है खर्च!!

Biotech ने है लाया, technology era में नयी क्रांति!
Biotech ने है मिटाया, फैली, दुनिया की झूठी भ्रान्ति!

Biotech  ने है डाला, हर technology में नया प्राण!
Biotech ही करेगा, नयी सदी में, नयी दुनिया का निर्माण!!

"Biotech will be the cause of our existence"  कहने की, वो आ गयी है घड़ी!
जैव-तकनीकी की  दुनिया. निराली है बड़ी!
इसी के बुनियाद पे,  ये दुनिया है खड़ी!!

Tuesday, February 2, 2010

2. मरहम एक टूटे दिल का (for girls)










दरिया के किनारे, मीठे यादों के सहारे!
मतवाली पगों से, मैं चला जा रहा था!!

हवा के झोकों से, कुछ सिसकियाँ आयीं!
जिन्हें सुन मुझमें, घबराहट सी छायीं!!

उस भयावह निशा में, सिसकियों की दिशा में!
सहमा हुआ मैं, थोड़ी दूर आया!
वंहा देखकर खुदको अटपटा सा पाया!!

पत्थर के पीछे, बड़े बरगद के नीचे,
इक लड़की निरंतर रोये जा रही है!
उसकी खोयी चेतना से, व् रोने की वेदना से,
चारोतरफ जैसे, मातम छा रही है!!

उसके जीवन में कुदरत ने,
ये कैसी हालात, है लायी!
प्रिय-मिलन के मौसम में (in valentine season),
वो दिल पे खंजर,क्यूँ खायी!!

ओ जगजननी, ओ दुखहरनी,
जब तू ऐसे हारकर रोएगी!
तो ये सृष्टी, जो तेरी शक्ति है,
यक़ीनन काल के मुख में सोएगी!!

न कर शिकवा किसी से,
किसी से शिकायत न कर!
कुदरत की इस परीक्षा में,
तू अपनी शक्ति को प्रखर!!

पुत्री रूप में खुशियाँ है तू,
बहन रूप में प्रतिपालक!
बहू रूप में लक्ष्मी है,
व् पत्नी रूप में जीव्चालक!!

अपरंपार है तेरी ममता,
सारा जग इसका गुणगान करे!
फिर क्षणिक खुशियों के खातिर क्यूँ,
तू अपनी महत्ता पे वार करे!!

जीवन के इस लम्बे सफ़र में,
इक सच्चा हमसफ़र आएगा!
जो इन निर्जन आंसुओं का,
सहज गरलपान कर जाएगा!!

इक बेहतर हमसफ़र  आएगा!
इक बेहतर हमसफ़र आएगा!!

Saturday, January 30, 2010

1. मरहम एक टूटे दिल का (for boys)


मदिरालय में बैठा विलाप रहा था,
मदिरा में उसको तलाश रहा था!
उसे देख अंदाज किया मैं,
वो टूटा दिल लिये लौट चला है,
ओह! प्यार भी ये कैसी बला है!

उसके जख्मों को सहलाने को,
कंद्रित मन को बहलाने को!
चुपके से उसके पास मैं आया,
व् कुछ इस तरह समझाया!

दिलवर ने जो मुख मोड़ा है,
मत सोच की दिल को तोडा है!
कुदरत की इक्षा से उसने,
ख्याबों से तुझे झझ्कोरा है!

वो चांद है तो, सूरज बन तू,
उसके चांदनी की, जरुरत बन तू!
तेरे बिन उसका अर्थ न हो,
कुदरत की ये इक्षा व्यर्थ न हो!

वो हार-मांस काया में,
कुदरत की भेजी माया में!
जबतक तेरी परछाई थी,
तबतक साथ निभाई थी!

इस जीवनपथ पे तुम बढे चलो,
निर्भीक हो अपना कर्म किये चलो!
ये काली घटा लौट जायेगी,
इक परछाई फिर से आएगी,
इक परछाई फिर से आएगी!!

Saturday, September 26, 2009

आत्मबोध


कर्म की नईया डोल रही है!
आत्मा व्याकुल हो बोल रही है!!
ओ साकी, अब सोना मत!
इन भवरों में, तुम खोना मत!!

सिर्फ़ पतवार, चलानी सीखी है!
मंजिल तुझको, कहाँ दिखी है!!
जब मंजिल की किरणे, आन लगेगी!
विचलन की भी, वाण चलेगी!!
इन वाणों से, आहत न होना रे!
क्षणिक सुखों के खातिर,
मंजिल की चाहत न खोना रे!!

नदी नहीं, सागर बन जा!
गंभीरता की, गागर बन जा!!
जब लहरें (distraction) तेरी, थम जाएँगी!
तभी नदियाँ (चंचलता), तुझमें खो पाएँगी!!

नईया के मस्तूल के भांति,
लहरों को थामे रखना है!
भूल न जाना की तुमको,
भवसागर से पार निकलना है!!

Tuesday, September 22, 2009

वो बैगन की खेती


यादों की नईया, जब हिचकोले लेती!
फिर याद आती, वो बैगन की खेती!!

हरे-नीले उजले, व् काले थे बैगन!
उन्हें देख झूम, उठता था अंतर्मन!!

अमित प्यार से, करता मैं सिचाईं!
उन्हें साथ देख, दूर रहती तन्हाई!!

दिन के उजाले में, करता मैं जुताई!
रातों के अँधेरे में, होती खूब पढाई!!

शारीरिक-मानसिक श्रम की, ऐसी संतुलन थी बनायी!
जिसने प्रतिकूल परिवेश में भी, सफलता दिलायी!!

जब जब इस दिल को, तन्हाई सताती!
वो बैगन की खेती, फिर याद आती!!

Saturday, September 12, 2009

'इंजीनियरिंग' मेरी भूल


इंजीनियरिंग में चयन हुआ जब,
गर्व हुआ घरवालों को!
जगा दिए सब अरमां दिल में,
इंजिनियर कहलाने को!!

किस्सा है वो पहले साल की,
बंधक हुए हम, खुद के जाल की!!

देर रात तक, रैगिंग होती!
सुबह क्लास भी, जल्दी होती!!

इस बेबस दौराहे पे,
दिख गयी रीना और मीना!
classes छोड़ सिखा गयी वों,
बिन-काम यारों संग जीना!!

टीचर्स और यारों के बीच,
होती अक्सर खिंचा-तानी!
साथ छोड़ टीचर्स का हम,
करने लगे थे मनमानी!!

दिन-महीने साल भी बीते,
फिर समय का आगाज हुआ!
बदनामी से डरने लगा,
जब नौकरी का मोहताज हुआ!!

अब यारों का भी साथ नहीं,
न रीना है न मीना है!
सोचा करता हूँ अब बस,
ये जीना भी क्या जीना है!!

Sunday, September 6, 2009

सनम की याद


मद्धम सी है शाम ढल रही!
मंद-मंद पुरवाई चल रही!!

फिर याद तुम्हारी आती है!
अक्सर तन्हा कर जाती है!!

वो दिलवर तू आ जा रे!
मद्य नयन छलका जा रे!!

होठों के पान कराने को!
तेरी झुल्फों में खो जाने को!!

आतुर ये पागल दीवाना है!
प्रीत चाँद-चकोरे के भी,
जिसके चाहत के न पैमाना हैं!!

इंतज़ार है तेरे आने का!
तेरा मुझको अपनाने का!!

अब प्यासे की प्यास बढ़ा न रे!
झुल्फों को लहराकर अपने,
स्पर्श का ज्ञात करा जा रे!!
वो दिलवर तू जा रे!
वो दिलवर तू जा रे!!

Tuesday, August 18, 2009

वतन की याद

हमें याद आती है, अब भी वतन की!
उस नीले गगन की, व् प्यारे चमन की!!

वो मम्मी की यादें, वो पापा की बातें!
वो संगीन लम्हें, वो दिन और रातें!

वो दोस्तों संग रहना, लड़ना-झगड़ना!
फिर साथ-साथ मिल के, हँसना-हँसाना!!

गुजर गया वो, रंगीन जमाना!
सोंधी मिट्टी की खुशबू, व् भोजपुरी गाना!!

वो मक्के की रोटी, वो आलू की सब्जी!
वो लिट्टी व् चोखा, याद आता है अब भी!!

वो होली की यादें, दिवाली की रातें!
लगता है बिछड़ गयीं, सारी कायनातें!!

याद आती है हमको, हरएक कण-कण की!
हमें याद आती है............................
उस नीले गगन की..........................

Sunday, July 12, 2009

मानवता



राह दिखाओ उनको यारों, जो मंजिल से दूर हुए हैं!
भले ही मंजिल नहीं मिली, वो भी थक-थक के चूर हुए हैं!!

मानवता का दीप बनो, ऐ जगे हुए इंसान!
सबको तुम जगाओ व्, बनो मानवता का प्राण!!

ये मत भूलो हमसब हैं, एक ही पिता (GOD) के संतान!
सबका जीवन सफल बने, कुछ ऐसा करो अनुष्ठान!!

वे भी परिश्रम बहुत किये हैं, कुछ कारणवश मंजिल से दूर हुए हैं!
राह दिखाओ उनको यारों, जो मंजिल से दूर हुए हैं!!
भले ही मंजिल नहीं मिली, वो भी थक-थक क चूर हए हैं!!!

वे भी जीवन-दर्पण के बनें विजेता, कुछ ऐसा करो प्रयास!
जीवनपथ क अधिपति बनें, जो आजतक हैं जीवन दास!!

सब कुछ संभव हो सकता है, अगर तुम लोगे ठान!
कुछ ऐसा कर डालो ऐ मानव, की सबकी मुरलिया छेड़े नयी तान!!

कल तक थे वे तुम्हारे ही साथी, आज वे तुमसे दूर हुए हैं!
राह दिखाओ उनको यारों, जो मंजिल से दूर हुए हैं!
भले ही मंजिल नहीं मिली, वो भी थक-थक क चूर हए हैं!!

Friday, July 10, 2009

माँ व् ममता


आओ सुनाऊं, जीवन की कहानी!
माँ व् ममता, कैसी होतीं दिवानी!!

हम उनके अंकुर हैं, उनके साँसों की धड़कन!
धरती पे आने से पहले, सांस लेने से पहले,
हुआ करते हैं हम, उनके अभिन्न अंग!!

खुद के अंगो की संरक्षण, होती जीतनी प्यारी!
माँ की ममता भी, उतनी होती न्यारी!!

स्वयं गीला रहकर, हमें सूखे पे सुलाती!
ममतामयी थपथपाहट से, निंदिया बुलाती!!

जब बच्चों को, कोई व्याधि सताती!
वो निर्भय हो, गरलपान कर जाती!!

उंगली पकड़ न सिर्फ, चलना सिखाती!
नैतिकता, सच्चाई व् आदर्शिता की, राह भी दिखाती!!

ओ जीवनदायनी, त्याग की मूर्ति,
तुझे व् तेरी ममता को, सत्-सत् नमन!
इतना साहस देना, की कर सकूँ तुझको 'तेरा जीवन' अर्पण!!

Saturday, April 18, 2009

अभिलाषा


जब झील सी सिमटी, छवि निराली,
व्याकुल करती मेरी जिज्ञासा!
चौकस करता अंतर्मन मेरा,
क्या यही है तेरी अभिलाषा!!

दीप बनोगे मानवता का,
कुछ ऐसा था तुमने ठाना!
चाहा कब था आपदा के,
इन भवंरों को गले लगाना!!

जिन हाथों ने तुझको थामा,
व् जीवनपथ के आलम्ब बनें!
छोड़ न जाऊँ उनको प्यासा,
कुछ ऐसे थी तेरी अभिलाषा!!

जीवन एक मिला है साकी,
रूककर व्यर्थ गवाओं न!
इस भाग-दौड़ की दुनिया में,
अपनों से साथ छुडाओ न!

जब निष्प्रभ हो याद कर लेना,
उन बेबस नयनों की आशा!
क्षणिक सुखों की बलि चढाकर,
चल पूरी कर अपनी अभिलाषा!

Saturday, March 21, 2009

पहला प्यार



मिली वो अनजान राहों पे,
डुबो गयी अपनी यादों में!

जाने क्या है ऐसा जादू किया,
मरू में ऊपवन का आभास दिया!

हरियाली सी है छाने लगी,
हरपल याद उसी की आने लगी!

डूब जाता हूँ उसकी ख्यालों में,
मदिरा बहती है नैनन के प्यालों में!

वो नयनें हैं या मधुशाला,
पागल है जीसने कर डाला!

नींद चुरायी, चैन चुराया,
उसके चेहरे के संवेदन से, बेचारा ये दिल घबराया!

जब जब बहती है पुरवाई,
दे जाती है हमें तन्हाई!

उसके छुवन ने है ये रोग लगायी,
शायद यही है प्यार की अगुवाई!

होली २००९


होली आती, स्मरण कराती, पिछली कितनी होली!
वो बचपन वाली टोली,कीचड़-पानी व् रंगों की रंगोली!!

इक बार दिल ने फिर ललकारा , होली खेलने जाना है!
इस होली में फिर से नये, प्यार का रंग चढाना है!!

कीचड़ का तो नाम नहीं था, रंगों का न कोई ठिकाना!
खुशियों का रंग बरसाएंगे, कुछ ऐसा था हमने ठाना!!

सबने थामी थी पिचकारी, हंसियों की बरसात हुई !
शायद उनको भी हमारे, रंग-ए-मुहब्बत की आगाज हुई !!

इस होली पे सबने सारे, बंधन को था तोड़ दिया!
शोख-आदयों से उन्होंने, इस सोये दिल को झाझ्कोड़ दिया!!

होली की रंगीन समां में, उनसे दिले की तार हुई!
दिलवालों के इस रंगोली में, दो दिलों की हार हुई!!

दो दिलों की हार हुई, दो दिलों की हार हुई....!!