Saturday, February 21, 2015

आधुनिक शिवपूजा- एक पाप










आज विशाल जो सोच रहा है,
कहने में संकोच रहा है !

लोगों को शायद तनिक न सुझा,
क्यों होती है शिव की पूजा !
क्या होता है शिव का अर्थ,
क्यों पूजा-पाठ सब रहा व्यर्थ !!

देकर दुनिया को अमृत,
कहते हैं विषपान किया !
विष को कंठ में धारण करके,
नीलकंठ का नाम लिया !!

कहता विशाल, सोचो-जानो,
विष के अवयवों को पहचानो !
काम-क्रोध, लोभ और माया,
उसी विष की हैं, प्रतिच्छाया !!

जो कोई इन अवयवों को,
काबू में रखना सीख जाता है !
शिव-ललाट पे चाँद के भाँती,
शीतलता, मुख पे पाता है !!

उसके जीवन से हर क्षण,
मैत्री की धार निकलती है !
जैसे गंगा, शिव के सर से,
निरंतर प्रफुस्टित होती है !!

गले में लिपटा हो भुजंग,
फिर भी, भयभीत नहीं होता है !
कितना भी गहन संकट आये,
संतुलन कभी नहीं खोता है !!

कैलाशपति शिव-शंकर के भाँती,
जो कोई निरंतर ध्यान करे !
प्रज्ञा रुपी तीसरी नेत्र जगाकर,
स्वयं का कल्याण करे !!

महंगाई के इस चढ़ते दौर में,
हम मूर्ति का दुग्ध-स्नान कराते !
अंधभक्ति में, विष का प्रतीक,
बेल-पत्र, धतूर और भांग चढ़ाते !!

पूरा दिन, लाउडस्पीकर में,
शिव-महिमा का गुणगान किया !
पर शिव-गुणों को अपनाने खातिर,
क्षण-मात्र भी नहीं ध्यान किया !!

काम-क्रोध की आग में जलकर,
क्षीण हो रही सहनशीलता !
लोभ-मोह के बंधन में बंधकर,
खो रहे हैं हम धीरता !!

रग-रग में दौड़ते इन विषों से,
जब मन-मंदिर में हो रहा हो दंगल !
फिर, भक्ति को कर्म-काण्ड बनाकर,
कैसे होगा किसी का मंगल !!

शिव का अर्थ की 'मंगल' होता!

जो इंसान, जिस क्षण भी,
शिव का गुण अपनाता है !
वही क्षण उसके लिए,
मंगलकारी हो जाता है !!

कर्म-काण्ड से बाहर आओ प्यारे,
शिव का गुण अपनाओ प्यारे !!
शिव का गुण अपनाओ प्यारे....

1 comment:

  1. Loved it bhai, the true shivbhakt means to be de-attached with success and failure, to understand that this world is one and we individuals are the components attached to each other in the matrix of air, water and soil.

    Dharya, sangharsh and samajik kalyaan ki ichcha svayam aa jayegi, shivbhakt wai jo sab tayag ker ekaagr ho apne lakhya pe laga rahe...Jai bhalonaat

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