Saturday, September 1, 2012

उलझन

तह-ऐ-दिल में तेरी तमन्ना छुपाये,
आरजू की तेरी सपनें संजोये!
सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं,
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं!!

जानता हूँ, तू मेरी किस्मत नहीं है,
पर तुझे खोने की, मुझमें हिम्मत नहीं है!!

दर्दों को भुलाकर, नींदों को सुलाकर,
चाहत में तेरी, किया खुद को अर्पण!
जब से तुने मुझसे, नजरें मिलायी,
नज़रों को तेरी, बनाया मैं दर्पण!!

फिर, हर फड़कन तेरे नाम का चिंगारी लाया,
हर धड़कन तेरी चाहत को जगाया!!

मुह्हबत में तेरी हुआ बावला मैं,
समझ न सका तेरी उलझी पहेली!
(जबकी) तेरी बेवफाई और तिर्या-चरित्र से,
हर रोज चेतायी, मेरी वो सहेली!!

पर जब-जब कहती वो, "तेरे लायक नहीं मैं",
मेरे दिल ने पूछा, "क्या अपना नायक नहीं मैं"!!

दिल के इस कथन पे,
चहकता चला मैं!
तेरे लटों की डगर पे,
बहकता चला मैं!!

मूरत को तेरी, मन-मंदिर में बसाये,
तृष्णा की ज्वाला, इस कदर है जलाया!
की सोचता हूँ अब किधर जाऊंगा मैं,
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...

जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...
जाकर किधर भी क्या पाऊंगा मैं...

1 comment:

  1. Nice Poem Bishal Babu...but its Triya Charitra not Tirya Charitra..:)

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